
इक सुकून भरा ये मंजर ,ये आवारगी फिज़ा की ,
कर देगी ये दीवाना ,गर ज़िद पे अपनी आए !
हवा का ठंडा झोंका ,शबनम की प्यारी बुँदे,
ये हमसे कह रहीं हैं ,कि दिल तेरा चुराएँ!
ये मदहोशियों का मौसम, ये तनहाइयों का आलम,
कुछ तुम भी गुनगुनाओ,कुछ हम भी गुनगुनाएं!
ये दिलनशी नज़ारें,ये उलझे -उलझे गेंसू ,
कुछ तुम इन्हें सवारों ,कुछ हम इन्हें सुलझाएं
ये नज़ाकतभरी अदा से, शर्मा के लबों का खुलना,
दीवानगी कि हद से ,कहीं हम गुज़र न जायें!


