Sunday, July 19, 2009

फिज़ा


इक सुकून भरा ये मंजर ,ये आवारगी फिज़ा की ,
कर देगी ये दीवाना ,गर ज़िद पे अपनी आए !


हवा का ठंडा झोंका ,शबनम की प्यारी बुँदे,
ये हमसे कह रहीं हैं ,कि दिल तेरा चुराएँ!


ये मदहोशियों का मौसम, ये तनहाइयों का आलम,
कुछ तुम भी गुनगुनाओ,कुछ हम भी गुनगुनाएं!


ये दिलनशी नज़ारें,ये उलझे -उलझे गेंसू ,
कुछ तुम इन्हें सवारों ,कुछ हम इन्हें सुलझाएं


ये नज़ाकतभरी अदा से, शर्मा के लबों का खुलना,
दीवानगी कि हद से ,कहीं हम गुज़र न जायें!

2 comments:

Empyrean Warrior said...

really ....
man ko zhakzhor dene waali poem hai.....
sachmuch adbhut

Ram said...

WoW! thats the weather m looking for :)