Sunday, May 24, 2009

क्यूँ

न तुमसे है कोई वादा,न ही मंजिल की कोई सूरत,
फ़िर भी मेरी नज़र में ये इंतज़ार क्यूँ है।

ये तुम भी जानते हो ये हम भी जानते हैं,
कि राहें जुदा जुदा हैं ,पर इस दिल का क्या करूँ मैं,
जो मुझसे कह रहा है,कि तुम्हारा साथ होगा ,
इसे ये ऐतबार क्यूँ है !

मैं सोचता हूँ अक्सर, कि तुम सोचती हो कैसे ?
क्या तुम्हारी ज़िन्दगी में ,कभी लाज़िम रहूँगा मैं भी ?
हाँ ऐसा ज़रूर होगा ,इसे ये ऐतबार क्यूँ है!

ये पहली दफा हुआ है ,कि जलने लगा हूँ मैं भी,
कोई तुम्हारे साथ हो तो, ख़ुद से कहने लगा हूँ मैं भी,
ये कौन आ गया है, इसे ये इख्तियार क्यूँ है!


2 comments:

Unknown said...

BAHUT BDHIYA LIKHTE HO..YAAR..KEEP IT UP

Unknown said...

bahut dino se kuch naya nahi likha..likho pls aur life ki khubsurti aur achchayion par hi likhna..i wanna live with u in my dream world forever.